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योग एक ऐसा शब्द है जिससे आज हिन्दुस्तान का लगभग हर शख्स परिचित है और इसका सारा श्रेय मैं पतंजली योगपीठ के संस्थापक योगगुरु स्वामी रामदेव जी को देता हूँ। वास्तव में योग एक ऐसी परंपरा है जो सदियों से भारत में थी किन्तु कालांतर में कुछ विदेशी आक्रान्ताओं के भारत में आक्रमण से लेकर शासन के दौरान यह सामान्य जन जीवन से लगभग लुप्तप्राय सी हो गई थी और केवल साधू-संतों और सन्यासियों तक ही सीमित रह गई थी। स्वामी रामदेव जी महाराज ने पहले दूरदर्शन के माध्यम से फिर स्वयं के आस्था चैनल के माध्यम से आम जनता को पुनः योग और प्राणायाम से रूबरू करवाया। ऐसा कहा जाता है कि स्वामी रामदेव जी बचपन में ही बहुत सी बीमारियों के शिकार थे और उन्होंने योग और प्राणायाम के माध्यम से पहले स्वयं को ठीक किया फिर आम आदमी को भी फायदा पहुँचाने लगे। खैर मेरा मुद्दा तो ये है की जैसा कि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज और पतंजली योगपीठ के द्वारा प्रचारित किया गया कि “करो योग रहो निरोग” तो क्या वास्तव में योग करने वाला पक्का निरोग रह सकता है? क्या वास्तव में कोई रोगी व्यक्ति लगातार योग करता रहे तो वो ठीक हो सकता है। तो जाहिर सी बात है कि पतंजलि योगपीठ और बाबा रामदेव जी के करोड़ों समर्थकों का यही कहना है की हाँ योग से सारी बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं। ऐसे ही कुछ समर्थकों के साथ मैंने यानी नीरज जोशी ने साल 2005 में आंशिक रूप से और साल 2008 में पूर्ण रूप से योग का दामन थाम लिया क्योंकि उस वक्त मैं बहुत बीमार रहता था और कहीं से भी उपचार नहीं मिल पा रहा था और उपचार के लिए पैसा भी नहीं था जबकि योग तो निशुल्क था। आप लोग किसी ऐसे रोगी की मनोदशा को समझ सकते हैं जिसे कोई ऐसी बीमारी हो कि जिसके कारण दो-चार लोगों के बीच उठने-बैठने में भी शर्मिन्दगी महसूस हो तो वो रोगी ठीक होने के लिए हर वो ऊपाय करता है जो उसे पता लगती हैं।

मुझे महाभयंकर कब्ज, गैस और हाइपर एसीडिटी थी जिसके कारण में यदा-कदा पाद मारता तो आँतों में सड़े भोजन की दुर्गन्ध से लोगों को बहुत तकलीफ होती और मुझे शर्मिन्दगी। यूँ तो खान-पान ठीक होने पर ये रोग नियंत्रण में आ जाने थे लेकिन उस वक्त मैं आदरणीय भाई राजीव दीक्षित जी को नहीं जानता था और स्वस्थ्य दिनचर्या के नियम सुने नहीं थे। जिन लोगों के साथ मैंने योग शुरू किया वो पतंजली के योग शिक्षक थे और लगभग साठ वर्ष की उम्र में भी एकदम तंदुरस्त थे तो मुझे भी पक्का विश्वास था की मैं भी स्वस्थ हो जाऊंगा। मैं नित्य-प्रति सुबह चार बजे उठता नहा-धोकर पाँच बजे तक योग करने पहुँच जाता। कब्ज थी इसके कारण सुबह पेट साफ नहीं होता तो भी योग शिक्षक के कहे अनुसार योग करता। शाम को पाँच बजे फिर से वही योग-प्राणायाम। परम पूज्यनीय स्वामी रामदेव जी के अनुसार कोई भी असाध्य बीमारी लगातार योग करते रहने पर अधिक से अधिक नौ महीने में पूर्ण रूप से ठीक हो जाती है तो मैं यही मानता की बस नौ महीने में मैं एकदम स्वस्थ हो जाऊंगा लेकिन नौ महीने निकल गए एक साल, दो साल, जाते-जाते पाँच साल बीत गए लेकिन मैं ठीक नहीं हुआ। हाँ योग मेरी दिनचर्या जरूर बन चूका था रात को दस बजे सोना सुबह चार बजे उठाना, नहाना-धोना फिर दो घंटे योग-प्राणायाम।
साल 2014 में हरियाणा के रेवारी में था तो मुझे आदरणीय भाई राजीव दीक्षित जी की स्वस्थ्य दिनचर्या के नियम नामक कैसेट मिली मात्र दस रुपये में हालांकि राजीव भाई को 2009 से जानता था लेकिन केवल क्रांति के व्याख्यान सुने थे स्वस्थ्य वृत के बारे में पता तक नहीं था तो जिस दिन राजीव भाई को सुना उसी दिन से उनके बताये नियमों पर चलना शुरू कर दिया तो धीरे-धीरे कब्ज और एसीडिटी की स्थिति में सुधार हुआ। हालांकि पूर्ण रूप से ठीक नहीं हो पाया लेकिन मुझे लगा अब योग और बढ़ा देना चाहिए तो सही हो जाऊंगा सो मैंने पंद्रह मिनट तक कपालभाति करना और सारे दंड-बैठक और व्यायाम और बाकी के सारे प्राणायाम करना शुरू कर दिया, ठीक होने के बदले मुझे कमर दर्द शुरू हो गया जो धीरे-धीरे बहुत बढ़ गया। 2015 तक मैं महाराष्ट्र आ चूका था और 2015 के अंत मैं जब मैंने अत्यधिक कमर दर्द से परेशान हो एक्सरे करवाया तो पता चला कि मेरे रीड की हड्डी में 1-1 सेंटीमीटर से ज्यादा का गैप आ चुका है। मेरे नैचुरोपैथी के डॉक्टर ने तुरंत मुझे योग-प्राणायाम सब बंद करवाया और मसाज आदि थैरेपी के द्वारा मेरी कमर को ठीक किया। अब तक (दिसंबर 2015) मैं जो परम पूज्य स्वामी रामदेव जी की अंध भक्ति में डूबा था ये उसका अंत था मैंने योग-प्राणायाम सब कुछ छोड़ दिया और केवल राजीव भाई के नियमों पर चलने लगा। बीमारी का असर कुछ कम तो था लेकिन पूर्ण रूप से ठीक नहीं (आज भी यदि राजीव भाई के बताये नियम न पालूं तो गैस, कब्ज, एसीडिटी जीना मुश्किल कर देती है)।
अब मैं योग-प्राणायाम नहीं करता लेकिन एक प्रश्न जरूर करता हूँ की क्या योग प्राणायाम से हर बीमारी ठीक होती है तो पतंजली समर्थक मुझे अरविन्द केजरीवाल, मानसिक रोगी, धोबी का कुत्ता और भी ना जाने क्या क्या कहते हैं लेकिन मेरे प्रश्न का सही जबाब आज तक किसी भी योग शिक्षक ने नहीं दिया। हो सकता है की मैं मानसिक रोगी हूँ किन्तु मैं एलोपैथी की कोई दवा साल 2008 के बाद से नहीं ले रहा हूँ लेकिन हर आयुर्वेद जानने वाले या हर प्राणायाम करने-कराने वाले योग शिक्षक से एक ही सवाल पूछ रहा हूँ कि यदि योग से सब ठीक होता है तो मेरे साथ इतने कॉम्प्लिकेशन क्यों?? कुछ योग शिक्षक कहते हैं की भाई बीमारियाँ तो हमें भी हैं लेकिन लोगों के सामने कहना पढ़ता है की योग करो सब ठीक होगा बाकी हम भी दवाइयां ही खाते हैं ….लेकिन मेरे लिए ये समाधान नहीं था इसलिए सतत मेरे दिमाग में ये प्रश्न आता रहा कि योग-प्राणायाम के बावजूद मैं ठीक क्यों नहीं हुआ? इसका जबाब मुझे मिला भूतपूर्व परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर आर. एन. वर्मा जी से.. उनकी रिसर्च स्वदेशी चिकत्सा भाग 5 से…..क्या बताया उन्होंने उसे मैं अपनी भाषा में लिख रहा हूँ….
भूतपूर्व परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर आर. एन. वर्मा जी जो की भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान में परमाणु बम बनाने के प्रोजेक्ट में काम कर चुके हैं उन्होंने राजीव भाई के स्वस्थ्यवृत के कैसेट को सुनकर उन नियमों पर वैज्ञानिक रिसर्च किया और आज भी राजीव दीक्षित मेमोरियल ट्रस्ट की तरफ से आम जनता को निशुल्क स्वास्थ्य लाभ दे रहे हैं। जब मैं उनसे मिला तो मेरा एक ही प्रश्न था की योग-प्राणायाम के बावजूद भी मेरी जिन्दगी में इतने कौम्प्लीकेशन क्यों??? उन्होंने मुझे अपने रिसर्च के अनुसार हर प्रकार की स्वदेशी चिकित्सा दी लेकिन बीमारियाँ पूर्ण रूप से ठीक नहीं हुई। आदरणीय वर्मा जी कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी को केवल एक महीने मैं ठीक कर देते हैं उनका मानना है की शरीर को दवा नहीं बल्कि शरीर स्वयं ठीक करता है लेकिन उनके उपचार से भी मैं ठीक नहीं हो पा रहा था तो उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया और मेरी नाड़ी देखी नाड़ी पकड़ते ही वो मेरी बीमारी को समझ गए, वास्तव में मेरी बीमारी कोई ऐसी बीमारी थी ही नहीं वो केवल एक डर था जो मेरे अन्दर बैठ चुका था। उन्होंने मुझसे मेरी निजी जिन्दगी, परिवार, नौकरी आदि के बारे मैं पूछा और सिर्फ एक बात कही कि नीरज वो परमपिता परमात्मा जो चाहता है सिर्फ वही होता है, तुम जब माँ के गर्भ में आये तभी अपने लिए अपना भाग्य, जिन्दगी सब कुछ लिखवाकर ले आये हो फिर किस बात से डरते हो। तुम जब तक अपने मन से एक अनजान से डर को नहीं निकाल देते तुम ठीक होने वाले नहीं हो। मैंने अनुभव किया मैंने डरना छोड़ दिया वो डर क्या थे मैं यहाँ नहीं लिख सकता लेकिन मैंने स्वयं को परमपिता परमात्मा के भरोसे छोड़ दिया और एक महीने से भी कम समय में ही असाध्य रोग बन चुका कब्ज निकल गया। अब मैं पाँच से साड़े छह बजे के बीच कभी भी उठता हूँ और दो गिलास गुनगुना पानी पीता हूँ तो दस से बीस मिनट में ही मेरा पेट पूरी तरह से साफ हो जाता है।
अब मैंने डॉक्टर आर.एन.वर्मा जी से भी यही प्रश्न किया कि क्या योग से सारी बीमारियाँ ठीक होती हैं तो उन्होंने जो जबाब दिया उसका मतलब है हाँ भी और नहीं भी। मैंने मतलब पूछा तो उन्होंने मुझे स्वदेशी चिकित्सा भाग-5 पड़ने को कहा वो पुस्तक पड़ने के बाद मेरे सामने सारी बातें खुल गई फिर मैंने कई बार डॉक्टर वर्मा जी के व्याख्यान भी सुने जिससे अज्ञान का पर्दा पूरी तरह से उतर गया। डॉक्टर वर्मा जी ने लिखा भी है और बताया भी है कि हम विकारों के कारण बीमार होते हैं यदि हम इन विकारों को दूर करना सीख लें तो हम कभी बीमार ही नहीं होंगे। मतलब हमारे धर्म ग्रंथों और पवित्र मार्गदर्शक ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि ये छह विकार हैं जिनके फेर में पड़कर आदमी विभिन्न व्याधियों से घिर जाता है और फिर उन व्याधियों को दूर करने के लिए डॉक्टरों या ज्योतिषों के पास चक्कर काटता फिरता है। ये सब करने के बाद भी वो ठीक नहीं होता तो परम पूज्यनीय स्वामी रामदेव जी महाराज के करोड़ों भक्तों में से किसी न किसी के जाल में फंसकर योग करना शुरू कर देता है।
अब जब योग करना शुरू करता है तो वो उसी भरोसे में होता है जिसमें कभी मैं हुआ करता था की योग करके तो मैं ठीक हो जाऊंगा और उस भरोसे के दौरान योग करते-करते कुछ लोग विकारों को नियंत्रित कर लेते हैं मतलब आत्मा का परमात्मा के साथ समर्पण भाव से मिलन कर देते हैं मतलब कि दीन-दुनिया को भूल जाते हैं, सारा तनाव, लोभ, मोह, काम, क्रोध सब कुछ त्याग देते हैं तो वो तो नौ महीने में ही असाध्य से असाध्य रोगों से भी ठीक हो जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो खुद को विकारों से मुक्त नहीं कर पाते, घर परिवार, बीबी, बच्चे, धन-संपत्ति, मान-प्रतिष्ठा आदि के चक्कर में पड़े रहते हैं तो वो फिर योग में मन नहीं लगा पाते और जब मन नहीं लगता है तो योग करने मैं एक बैचेनी का अनुभव होता है। सिद्धांत रूप में बैचेनी की अवस्था में योग करना ही नहीं चाहिए लेकिन कोई भी योग शिक्षक ये बात नहीं जानता तो वह उस व्यक्ति को जबरदस्ती योग करने को कहता है तब वह आदमी या तो बाबाजी के क्रांति एवं भक्ति गीत सुनते हैं या आस्था चैनल लगाकर योग करना शुरू कर देते हैं।
मैं भी जब योग के लिए बैठता था तो मन में विकारों का द्वन्द चलता रहता था, किसी ने बेइज्जती कर दी या बौस ने डांटा हो, धन-संपत्ति, मान-प्रतिष्ठा का लोभ हो या फिर विषया शक्ति का वेग हो या कुछ भी विकार हो या बाल-सुलभ मन के स्वपनलोक की कोई दुनिया हो ये सब द्वन्द मन में प्राणायाम के दौरान भी चलते रहते थे। इनसे उबरने के लिए मैंने आस्था चैनल लगाना शुरू कर दिया। आस्था मैं स्वामी जी कांग्रेसियों को कोस रहे होते तो मन में कांग्रेसियों के प्रति क्रोध और नफरत भर जाता और देश को तत्कालीन दुर्दशा से निकालने के लिए नया द्वन्द चल पड़ता माने भ्रस्तिका या अनुलोम-विलोम कर तो रहा हूँ लेकिन विकारों में बंधा हुआ हूँ तो मन तो कभी भी स्थिर हुआ ही नहीं और जब तक मन स्थिर न हो तब तक योग कैसा और जब तक वास्तविक योग न हो तब तक रोगों से मुक्त कैसे हो सकता था। दूसरा मेरे को जो भी रोग थे वो पित्त और कफ के रोग थे जिनमें प्रचुर मात्रा में नींद जरूरी होती है लेकिन स्वामी जी को देखकर मैं दस बजे सोता और चार बजे उठता फिर खुद को जवान मानकर तेज गति से किये जाने वाले व्यायाम करने लगता तो शरीर में बायु का प्रकोप भी बढ़ने लगा और कमर दर्द या रीड की हड्डी में गैप आने तक पहुँच गया। मैंने कई बार श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ी और खासतौर पर वही अध्याय पढ़ा जो ध्यानयोग से सम्बंधित है उसके ऊपर पुराने ऋषि-मुनियों या साधू-संतों के लेख पढ़े तब मुझे समझ आया जो डॉक्टर वर्मा जी ने कहा था की योग से सब बीमारियाँ ठीक भी होती हैं और नहीं भी होती हैं।
यूँ तो ब्लॉग काफी बढ़ा हो गया लेकिन उम्मीद है कि मेरे अंधभक्त मित्रों को भी जरूर समझ में आ गया होगा कि योग से हर कोई क्यों ठीक नहीं हो सकता है और यदि अभी भी ठीक से समझ नहीं आया तो कुछ पुस्तकें जरूर पढ़ें-
स्वदेशी चिकित्सा भाग 5- लेखक- डॉक्टर आर. एन. वर्मा जी (राजीव दीक्षित मेमोरियल ट्रस्ट 8380027025 से मगाएं।)
गीता तत्व विवेचनी – लेखक-जयदयाल जी गोयन्दका (गीताप्रेस गोरखपुर से मगाएं)
साधक संजीवनी – लेखक – संतश्री रामसुखदास जी महाराज (गीताप्रेस गोरखपुर से मगाएं)

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